दिल्ली, 7 नवंबर 2019. दुनियाभर के 153 देशों के 11,000 से अधिक वैज्ञानिकों ने वैश्विक जलवायु आपातकाल की घोषणा की है। वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि उन मानव गतिविधियों में व्यापक और स्थायी बदलाव के बिना बहुत बड़ा नुकसान होना तय है जिनका योगदान ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन और जलवायु परिवर्तन से संबंधित अन्य कारकों में होता है।

40 से अधिक वर्षों के वैज्ञानिक विश्लेषण पर आधारित
‘‘बायोसाइंस’’ नामक पत्रिका में मंगलवार को प्रकाशित एक शोध-पत्र में, भारत से 69 सहित 11,258 वैज्ञानिकों ने जलवायु परिवर्तन के वर्तमान लक्षण को प्रस्तुत किया है और इससे निपटने के लिए उठाए जा सकने वाले प्रभावी कदमों का उल्लेख किया है। जलवायु आपातकाल की घोषणा ऊर्जा उपयोग, पृथ्वाी के तापमान, जनसंख्या वृद्धि, भूमि क्षरण, पेड़ों की कटाई, ध्रुवीय बर्फ द्रव्यमान, उत्पादन दर, सकल घरेलू उत्पाद और कार्बन उत्सर्जन सहित एक व्यापक क्षेत्र को कवर करने वाले सार्वजनिक रूप से उपलब्ध डेटा के 40 से अधिक वर्षों के वैज्ञानिक विश्लेषण पर आधारित है।

पृथ्वी बचाने सिर्फ 11 वर्ष का है समय
यूनाइटेडनेशन के इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज के अनुसार पर्यावरण परिवर्तन के टिप्पिंग प्वाइंट पर पहुंचने में सिर्फ 11 वर्ष अर्थात लगभग 4000 दिन बाकी है. इसके बाद यही स्थिति रही तो पर्यावरण को ग्रीन हाउस गैसेस से बचाना असंभव हो जाएगा.

क्या असर होंगे इस पर्यावरण परिवर्तन के चक्र को अपरिवर्तनीय स्थिति में पहुंचने से
ग्रीनलैंड अंटार्कटिक के बर्फ के ग्लेशियर वर्ष 2030 के बाद से बड़ी मात्रा में पिघलने लगेंगे जिससे समुद्र का जलस्तर बढ़ जाएगा. जिससे विश्व के समुद्र तटों पर रहने वाले और आश्रित 134 करोड़ आबादी को उन स्थानों को छोड़ना पड़ेगा जो की ग्लेशियर समाप्त हो जाने, जल स्तर बढ़ जाने और समुद्री तूफान और अन्य गतिविधियां बढ़ जाने से वहां नहीं रह पाएंगे.

वर्ष 2100 आते-आते तक विश्व के कई द्वीप समुद्र के पानी के अंदर समा जाएंगे हमारे देश का अंडमान निकोबार रहने लायक नहीं रह पाएगा. बांग्लादेश का काफी बड़ा भाग दुकान में आ जाएगा और वहां के निवासियों का व्यापक माइग्रेशन हमारे देश में होगा.

मुंबई के किनारे के लोगों को भी मुंबई छोड़कर छोड़कर देश के भूभाग के अंदर की तरफ आना पड़ेगा. देश में व्यापक रूप से रहने के लायक जगह की कमी हो जाएगी.

दूसरी तरफ हमारे देश में हिमालय के ग्लेशियर पिघलने से पहले तो व्यापक रूप से बाढ़ आएगी. बाद में जो बर्फ के ग्लेशियर हमारी जीवनदायिनी नदियों को वर्ष भर पानी देते हैं वह बर्फ के ग्लेशियर नहीं रहेंगे. जब यह बर्फ के ग्लेशियर नहीं रहेंगे तो नदियां सूखने लगेगी इससे हमारे देश में व्यापक रूप से खेती प्रभावित होगी पानी की कमी होगी. यद्यपि यह सब धीरे-धीरे ही होगा परंतु अपरिवर्तनीय जलवायु परिवर्तन के होने वाले असर हजारों प्रकार के होंगे जिसमें बीमारियां वायु प्रदूषण यह सब शामिल रहेगा और आने वाली पीढ़ियों को कष्ट पूर्वक अपना जीवन गुजारना पड़ेगा.

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