January 30, 2023

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अपने जीवनकाल में हर पांच महिलाओं में से एक अवसाद से पीड़ित है: डॉ. आभा सिंह

रायपुर। इंडियन मेनोपॉज़ सोसायटी के रायपुर चैप्टर द्वारा वीआईपी रोड स्थित होटल बेबीलॉन इंटरनेशनल में दो दिवसीय राज्य स्तरीय सम्मेलन के पहले दिन देश भर से 200 से अधिक डॉक्टर शामिल हुए। आज कांफ्रेंस की मुख्य अतिथि संस्थापक चैप्टर सेक्रेटरी और संरक्षक डॉ. आभा सिंह है, जो मेडिकल कॉलेज की डीन और आयुष विश्वविद्यालय की वाईस चांसलर भी हैं। गेस्ट फैकल्टी के रूप में कोलकत्ता से इंडियन मीनोपॉज प्रेजिडेंट रतनाबलि चक्रबोर्ती, कोकिलाबेन हॉस्पिटल मुंबई से डॉ अर्चना शेट्टी और अहमदाबाद से डॉ नीता ठाकरे हैं।
व्याख्यान का आधारभूत विषय “रजोनिवृत्ति के दौरान अवसाद” था जो की स्वयं डॉ. आभा सिंह द्वारा दिया गया।

“हर महिला का रजोनिवृत्ति का अनुभव अलग होता है और अधिकांश महिलाओं में ऐसे लक्षण पाए जाते है जो उनके व्यक्तिगत, पारिवारिक एवं कामकाजी जीवन पर नकारात्मक प्रभाव डालते है। रजोनिवृत्ति कई अलग अलग लक्षण उत्पन्न कर सकती है, कारण है एस्ट्रोजन (यह वह मुख्य हार्मोन है जो कि रजोनिवृत्ति के दौरान आपके शरीर में कम हो जाता है) यह आपके शरीर के कई अलग अलग भागों को प्रभावित करता है जैसे आपके मस्तिष्क और आपकी भावनाऎं। अगर कोई महिला डिलीवरी के बाद अवसाद से पीड़ित थी तो उसके रजोनिवृत्ति के दौरान फिर से अवसादग्रस्त होने की सम्भावना ज़्यादा होती है।” यह बात डॉ. आभा सिंह ने अपने मुख्य व्याख्यान में कही।

“महिलाओं को पेरिमेनोपोज के दौरान निम्नलिखित में से कुछ लक्षणों का अनुभव हो सकता है। लेकिन घबराइए मत हो सकता है आपको इन लक्षणों में से कुछ का अनुभव हो या किसी का भी अनुभव न हो। मासिक स्त्राव में बदलाव, हॉट फ्लॅशेस, रात को पसीना, नींद न आना, थकान, चिंता, कामेच्छा या सेक्स ड्राइव में कमी, योनि में सूखापन, स्तन में कोमलता, सूजन, दर्द और मांसपेशियों और जोड़ों में दर्द। इनका उपचार लक्षणों की गंभीरता पर आधारित होता है।” डॉ. सिंह ने कहा चूंकि सर्जिकल रजोनिवृत्ति से महिलाओं को अधिक खतरा है तो यह सलाह दी जाती है कि यदि संभव हो तो स्त्री रोग विशेषज्ञ को प्रयत्न करना चाहिए की जिन रोगियों के केसेस में गर्भाशय निकलने की आवश्यकता उत्पन्न हुई हो उन्हें रजोनिवृत्ति की प्राकृतिक उम्र तक टाला जा सके जोकि उन रोगियों के लिए अधिक फायदेमंद होता है।

डॉ. आभा सिंह ने विशेष जोर देते हुए कहा कि “इस चरण में महिलाओं में एम्प्टी नेस्ट (खालीपन) का सिंड्रोम काफी लोकप्रिय है। जब रजोनिवृत्ति का चरण शुरू होता है तो यह वही समय होता है जब महिलाएं आमतौर पर अकेली रहती हैं क्योंकि उनके बच्चे अपने जीवन में रच बस चुके होते है और पति भी अपने व्यापार या नौकरी के शीर्ष पर काम में व्यस्त होते है। इसलिए किसीको उसके लिए बहुत कम या कोई समय नहीं मिल पाता। यह खालीपन इस सिंड्रोम को जन्म देता है जहां महिला काम करने या व्यस्त रहने के बावजूद उसे जीवन में खालीपन लगने लगता है। यह भी अवसाद का अतिव्यापी कारण है जो रजोनिवृत्ति के दौरान होता है। ”

इंडियन मेनोपोज सोसाइटी के ओर्गनइजिंग चेयरपर्सन डॉ तृप्ति नागरिए व डॉ. मनोज चेल्लानी ने मीडिया को ब्रीफिंग करते हुए कहा, “यह क्षेत्र के विशेषज्ञों के लिए जानकारी भरे सत्रों के साथ एक शिक्षाप्रद शुरुआत थी। जैसा कि उम्मीद थी, सम्मेलन द्वारा पूरे भारत से कई अतिथि वक्ता, जो अपने क्षेत्रो के दिग्गज है, अपने विषय विशिष्ट ज्ञान को साझा करने के लिए आये। यह मध्यम आयु वर्ग और बुजुर्ग महिलाओं के जीवन की गुणवत्ता में सुधार करने में मदद करेगा। ”

आईएमएस की ओर्गनइजिंग सेक्रेटरी डॉ. सुषमा वर्मा ने कहा, “महिला की बढ़ती आयु के साथ उनका शरीर प्रजनन में शामिल मुख्य हार्मोन एस्ट्रोजेन और प्रोजेस्टेरोन को उत्पन्न करने की मात्रा कम कर देता हैं। जब ये हार्मोन उत्पन्न होना अत्यंत कम हो जाते है, तब महिला का मासिक धर्म चक्र स्थायी रूप से रुक जाता है। रजोनिवृत्ति आधिकारिक तौर पर महिला की आखिरी माहवारी के बारह महीने बाद शुरू होती है। ज्यादातर महिलाएं 45 से 55 वर्ष की उम्र के बीच रजोनिवृत्त होती है। प्रारंभिक रजोनिवृत्ति वह रजोनिवृत्ति है जो 40 से 45 वर्ष की उम्र के बीच शुरू होती है। समय से पहले रजोनिवृत्ति 40 साल से पहले भी शुरू हो सकती है। डॉ सुषमा वर्मा ने आगे बताया की कैंसर होने से पहले शारीरिक बदलाव जो की स्तन एवं बच्चेदानी में होते हैं उनके जाँच एवं इलाज जिससे कैंसर को होने से रोका जा सकता है। कैंसर से होने वाले मृत्युदर को बहुत कम किया जा सकता है।”

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