October 5, 2022

Suyashgram.com

मासिक पत्रिका एवं वेब न्यूज़ पोर्टल

आम नागरिकों की सरकारी हत्या का दोषी कौन?

पाकिस्तान द्वारा  गोलीबारी में  5 भारतीयों की मौत  और  देश में ही तूतीकोरिन हिंसा में अब तक 13 हिंदुस्तानियों की मौत

 

(संदीप तिवारी) रायपुर। पड़ोसी देश पाकिस्तान द्वारा गोलीबारी में जब भारतीय नागरिकों की जान जाती है, तो देश का खून खौलता है और लोगों में पाकिस्तान पर हमला कर देने की भावना उफान मारती है,लेकिन क्या हो जाता है देश को जब हमारी अपनी पुलिस 13 प्रदर्शनकारियों की जान ले लेती है?

दो वक्त की रोटी,पीने का साफ पानी,सांस लेने को साफ हवा और आत्म सम्मान का जीवन यही है आम भारतीय की मूलभूत आवश्यकता, जिसे उपलब्ध कराना तो दूर हमारी सरकारें जो है उसे भी छीनने में लगी हैं । वेदांता ग्रुप के स्टरलाइट इंडस्ट्री  द्वारा  भू जल के प्रदूषण का विरोध कर रहे  प्रदर्शनकारी  कोई आतंकवादी नहीं थे। राज्य सरकार के मुलाजिम पुलिस वाले उन प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाते हैं जो अपने क्षेत्र के भूजल में हो रहे प्रदूषण को रोकने के लिए एक इंडस्ट्री के खिलाफ प्रदर्शन करते होते हैं, और 13 लोगों की जान चली जाती है और ना जाने कितने अभी भी घायल अवस्था में मौत और जिंदगी के बीच जूझ रहे होंगे।

भीड़ उग्र हो सकती है, कभी गलत प्रबंधन की वजह से हिंसक भी हो सकती है, लेकिन आम जन की रक्षा के लिए ही बनाई गई पुलिस जो समाज में देश में कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए जिम्मेदार है उसकी क्या जिम्मेदारी होती है?  क्या किसी उग्र भीड़ या प्रदर्शन का प्रबंधन कैसे किया जाता है इसका प्रशिक्षण पुलिस को नहीं दिया जाता है?  दुनिया भर में ऐसे प्रदर्शन जब होते हैं तो भीड़ को नियंत्रित करने के लिए चेतावनीयाांं दी जाती हैं, अश्रु गैस के गोले छोड़े जाते हैं, रबर की गोलियों का इस्तेमाल किया जाता है और जब कोई रास्ता नहीं बाकी होता तथा जब पुलिस को स्वयं की जान का खतरा बन जाता है तब कहीं असली गोलियों का इस्तेमाल किया जाता है, जिसे चलाने के लिए भी स्पष्ट दिशा निर्देश होते हैं की गोलियां कमर के नीचे के हिस्से में मारी जाए, क्योंकि मुख्य उद्देश्य भीड़ को नियंत्रित करने का होता है उन्हें जान से मारने का नहीं।

अब यहां सवाल यह उठता है कि तमिलनाडु राज्य सरकार के अंतर्गत राज्य की पुलिस क्या बिना किसी ऊपरी आदेश के ऐसा नरसंघार कर सकती है? क्या इन मौतों के लिए सिर्फ चंद पुलिस अधिकारीयों को दोषी मानकर उन्हे सस्पेंड कर देना काफी है? क्या इस बात की जांच नहीं होनी चाहिए कि सरकार में बैठे किस राजनेता अथवा किस जिम्मेदार पदाधिकारी द्वारा ऐसे निर्देश दिए गए?

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री का दामन 13 लोगों के खून से भीगा हुआ है ऐसे में उनका नैतिक दायित्व क्या बनता है? यह कोई रेल दुर्घटना नहीं कि रेल मंत्री इस्तीफा दे, तूतीकोरिन की जनता के मन में शायद यह विचार आए की यह तो सीधे-सीधे हत्या है, सरकार द्वारा प्रायोजित हत्या, हमारी अपनी सरकार का किया गया जलियांवाला बाग कांड ।

इस तरह की घटनाएं ब्रिटिश काल में होती थी, लेकिन स्वतंत्र भारत में ऐसी घटना का होना पूरे देश के लिए, पूरे लोकतंत्र के लिए शर्म का विषय है। लेकिन दुख की बात यह भी है कि आम आदमी के जीवन की कोई कीमत आज के भारत में दिखाई नहीं देती है, ऐसी घटनाओं पर आमजन का खून भी उबाल नहीं मारता, ऐसा लगता है मानो जनता ने अब स्वीकार कर लिया है की आम लोग तो मरने के लिए ही होते हैंं।  स्वतंत्र भारत में पहले भी ऐसी घटनाएं हुई हैं,जब किसानों-मजदूरों प्रदर्शनकारियों को पुलिस ने सीधे गोलियां मारी है। कुछ वर्ष पहले पुणे मेंं निहत्थे किसानों को जो अपनी जमीन अधिग्रहण का विरोध कर रहे थे उन्हें पुलिस ने दौड़ा-दौड़ाकर गोली मारी, लेकिन ऐसी घटनाओं की अंतिम परिणीति होती है एक जांच समिति ,कुछ पुलिसवालों का तबादला या अधिक से अधिक सस्पेंशन तथा राज्य सरकार द्वारा मृतकों के लिए मुआवजे की भीख की घोषणा। उन राजनेताओं का क्या जो ऐसे दमनकारी विचार से फलीभूत अधिकारियों को ऐसा आदेश देते हैं ? क्या हमारे देश का कानून उनकी जिम्मेदारी भी स्थापित कर सकेगा यह एक आत्म चिंतन का विषय है ।

लेकिन स्वतंत्र भारत में एक भी ऐसी घटना आमजन के बीच किस तरह का क्रोध उत्पन्न करती है इसका अंदाजा शायद राजनेताओं को नहीं है आज हम उग्रवाद नक्सलवाद की जो समस्याएं अपने सामने मुंह बाए खड़े देखते हैं उसमें शायद ऐसे पैदा की गई कुंठाओं का भी योगदान  होगा।

 

 

Spread the love

You may have missed