October 5, 2022

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जापान की इस फसल ने छत्तीसगढ़ की पहाड़ी को बना दिया फूलों का बाग

रायपुर। 10 मार्च 1959 को चीन ने तिब्बत पर कब्जा कर लिया और धर्मगुरू दलाई लामा को निर्वासित किया गया। दलाई लामा सहित लाखों तिब्बतियों को भारत ने शरण दी। उन्हें यहां के पहाड़ी क्षेत्रों में बसाया गया। उत्तरी छत्तीसगढ़ की पहाड़ियों में भी तिब्बती शरणार्थी कैंप बनाए गए। मैनपाठ में बसे तिब्बती अपने साथ एक खास तरह के बीज लेकर आए थे। यह थे टाऊ के बीज। इन दिनों जशपुर जिले के पंडरापाठ की पहाड़ियों में टाऊ की फसल लहलहा रही है। तापमान गिरने के साथ ही तुषार काल में ओश की बूंदे इन फसलों पर पड़ रही हैं और पहाड़ी वादियों में इसके खूबसूरत फूल दूर-दूर तक नजर आ रहे हैं।

उपवास में खाने के काम आता है इसका आटा

यह एक ऐसी फसल है जिसका उपयोग बड़े पैमाने पर जापानी और चीनी अपने दैनिक भोजन में करते रहे हैं। इसके साथ ही जापानी पक्षियों के चारे के रूप में भी इसका इस्तेमाल होता है। भारत में टाऊ की फसल को फलाहारी भोजन माना जाता है और इसके आटे को उपवास के दौरान लोग खाते हैं।

मैनपाठ और पंडरापाठ में उगाए जाने वाला टाऊ यहां के किसानों की आए का प्रमुख जरिया है। यहां से यह फसल जापान को निर्यात भी की जाती है। आज कल मोमोस नामका फास्ट फूड भी बाजार में काफी चलन में आया है। इसे बनाने के लिए भी टाऊ के आटे का इस्तेमाल होता है।

कड़ाके की ठंड में होती है अच्छी खेती

ठंड के दिनों में 1 से 2 डिग्री नीचे तक गिरने वाला पारा के साथ भारी मात्रा में होने वाला तुषारपात इस फसल के लिए आदर्श वातावरण होता है। पाठक्षेत्र में अनुकूल परिस्थितियों ने किसानों को इस फसल की ओर आकर्षित किया। यहां से मैनपाट गए कुछ ग्रामीणों ने प्रयोग के तौर पर फसल लिया।

अच्छी फसल मिलने पर साल दर साल टाउ के रकबे में बढ़ोतरी होती गई। जिले में फिलहाल 2 हजार एकड़ में टाउ की फसल लगे होने का अनुमान लगाया जा रहा है। इस फसल पर कीट व्याधियों का असर बहुत कम होता है।

आकर्षित हो रहे सैलानी

टाउ के फूल पंडरापाठ और मैनपाठ की पहाड़ियों को और भी खूबसूरत बना देते हैं। दूर-दूर तक लगी टाऊ की फसल में खिले खूबसूरत फूल यहां आने सैलानियों को बेहद आकर्षित करते हैं। वाले फलाहारी आटे के रूप में इसका इस्तेमाल होता है। यहां से 30 रुपये किलो की दर से खरीदे जाने जाने वाला टाउ कुट्टू का फलाहारी आटा बनकर 200 रुपये किलो तक बिकता है। टाउ की फसल लेने वाले किसानों की सबसे बड़ी परेशानी है कि अब तक सरकार ने उन्हे प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के दायरे में नहीं लाया है।

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