December 2, 2022

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संपादकीय: धरती के उत्पन्न करने की क्षमता से दोगुनी रफ़्तार से हम कर रहे धरती का दोहन, जानिए “अर्थ ओवर शूट डे”

धरती का हम लगातार दोहन कर रहे है यह तो सभी को पता है किन्तु धरती कितना उत्पादन करती है और हम कितना उसका दोहन करते है ये हमें नहीं पता होता है। धरती द्वारा वायुमंडल में हवा पानी उत्पन्न करने की एक क्षमता है वह एक वर्ष में एक नियत मात्रा में हमें यह सब दे सकती है जो हामारे जीवन को जरूरी है। इसी दिशा में अर्थ ओवरशूट मनाया जाता है।

Earth Overshoot day पढ़कर एैसा लगता है कि जरूर ही हैप्पी बोलने का दिन है पर ऐसा नहीं है; यह दिन अनहेप्पी Earth Overshoot day कहने का दिन है।

आपको बात दें कि यह वह दिवस है जिस दिन धरती की प्रतिवर्ष की बायोकैपेसिटी को हम खत्म कर देते है अर्थात् धरती जो एक वर्ष में उत्पन्न कर सकती है, हमें देती है उस को जिस दिन हम समाप्त कर देते है जैसे कि कार्बन सोखने की क्षमता, प्राकृतिक संसाधन। अन्य शब्दों में एक जनवरी से 31 दिसम्बर तक धरती जो हमें देती है, जिस दिन उसे हम समाप्त कर देते है उसे Earth Overshoot day (EOD) कहते है। वर्ष 2018 को यह दिन 153 दिन पहले एक अगस्त को ही आ गया है। EOD के कंसेप्ट का विचार पहली बार यू.के. के एन्डू सीमेन को आया और उनकी संस्था न्यू इकानामिक फाउन्डेशन ने कंसेप्ट डेवलप किया, संस्था सहयोगी भागीदार ग्लोबल फुटपिंट नेटवर्क के साथ जागरूकता अभियान चलाती है।

EOD के बढ़ते दिनों का मुख्य कारण है मानव द्वारा की जाने वाली खपत, कम होते जंगलों से ग्रीन हाउस गैसों का वनों द्वारा न सोख पाना, बायोडाइवरसिटी का विनाश इत्यादि इत्यादि अनेक मानव निर्मित कारण। इसका ज्वलंत दुष्परिणाम है बढ़ती हुई बीमारियां जिसका संबंध सीधे पर्यावरण और प्रदूषण से रहता है।

वर्ष 1970 के पहले तक स्थिति एैसी नहीं थी पहली बार Overshoot 1970 के दशक में हुआ तब पहली बार हमने धरती जो हमें एक वर्ष में देती है वर्ष के पहले ही खत्म कर दिया। इसके बाद तो हमारी खपत अन्धाधुन बढ़ती गई 1987 में EOD 19 दिसम्बर को आया। वर्ष 2000 में 1 नवम्बर, वर्ष 2005 में 20 अक्टूबर, वर्ष 2010 में 21 अगस्त, वर्ष 2015 में 13 अगस्त, वर्ष 2017 में 2 अगस्त और वर्ष 2018 में 1 अगस्त।

इस वर्ष की बात करें तो हमने 153 दिनों पहले धरती द्वारा दी जा रहे जीवन उपयोगी उपहारों को समाप्त कर दिया है, इस वर्ष 31 दिसम्बर तक हम धरती का 1.7 गुणा दोहन करेंगे। पर्यावरण को हुई एक मिनिट की क्षति को हम वापस नहीं कर सकते परंतु अगर हम EOD को प्रतिवर्ष 5 दिन कम करें तो वर्ष 2050 तक ही हम उस स्थिति में पहुच पायेंगे जबकि धरती जितना हमें देती है उतना ही हम खपत करें। जनसंख्या इसी गति से बढ़ती रही तो 2050 के आगे बढ़ना मुस्किल हो जायेगा।

दुनिया को बचाने वाली खिड़की लगभग बन्द हो चुकी है। स्टेनटफोर्ड यूनिवर्सिटी तथा मेक्सिको की यूनिवर्सिटी ने एक अध्ययन में बताया है कि हम पृथ्वी के छटे विनाश की ओर बढ़ चुके है दो या तीन दशक में ही एैसी परिस्थितियां निर्मित हो जावेगी जो कि बायोडायवरसिटी पर एैसा धावा बोलेंगी जो कि भविष्य के जीवन का निराशजनक और शोकजनक पिक्चर आयेगा जिसमें मानव भी शामिल होगा।

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